Sunday, March 25, 2018

"भगत सिंह जैसे हमारे असल नायकों को हमसे छीन लिया गया और उनकी जगह विदेशी लड़ाकू थोप दिए गए," कहती हैं पाकिस्तानी लेखिका

पाकिस्तानियों को आज़ादी दिलाने वाले असल नायकों को उनसे छीन लिया गया है और उनकी जगह विदेशी जंगजूओं को हीरो बना कर थोप दिया गया है.

ये कहना है पाकिस्तानी लेखिका फ़रह लोधी खान का जो कि उर्दू ऑनलाइन पत्रिका 'हम सब' की एक स्तंभकार हैं.

फ़रह कहती हैं, मेरे हीरो भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और वे सारे नौजवान हैं जिन्होंने हिन्दोस्तान की आज़ादी के लिए अपना खून बहाया. ये नौजवान केवल भारत के ही नहीं बल्कि हमारे भी हीरो हैं.

भगत सिंह की बरसी (23 मार्च 2018) पर प्रकाशित अपने लेख में फ़रह कहती हैं कि पाकिस्तानियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया गया है. उनसे मज़हब की झूठी बुनियादों पर उनके असली हीरो और "धरती के रखवाले" छीन लिए गए. उन्हें कभी बताया ही नहीं गया कि उनपर वास्तव में एहसान करने वाले कौन थे.

पाकिस्तानियों की सोच को मज़हब और पंथ की सरहदों में क़ैद कर दिया गया और विदेशी आक्रमणकारियों को उन का हीरो बना दिया गया.

फ़रह एक ब्लॉग भी लिखती हैं. उनका ट्विट्टर आई डी @farah_lodhi है.

पेश है फ़रह का भगत सिंह पर लिखा उर्दू लेख जिसका मैंने हिंदी में अनुवाद किया है. 
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आज़ादी के हीरो भगत सिंह की बरसी

फरह लोधी खान - ‘हम सब’ मैगज़ीन (पाकिस्तान), 23 मार्च 2018

23 मार्च 1931 को लाहौर के मौजूदा शादमान चौक पर तीन व्यक्तियों को आज़ादी की जदोजहद के जुर्म में फांसी की सज़ा दी गई. वो तीन व्यक्ति जो हमारी आज़ादी के हीरो थे उन के नाम थे भगत सिंह, राज गुरु और सुखदेव.

हमारी बदकिस्मती है कि हमें सोमनाथ के मंदिर तो पढ़ा दिए, इस्लाम की जंगें जीतने वालों के बारे में तो बता दिया, मगर हमारे अपने हीरो हम से छीन लिए गए. सिर्फ़ 86 साल में हम ने भुला दिया कि हमारी आज़ादी की बुनियादों में जो खून डाला गया उस का रंग सिर्फ एक था: लाल.

उस खून का कोई मज़हब या पंथ नहीं था.

वो आज़ादी जिस का श्रेय हम सब सिर्फ अपनी अपनी पसंद के लोगों और अपने अपने समुदाय के बुजुर्गों को देते हैं, इस में एक बहुत बड़ी कुर्बानी उस बहादुर नौजवान की भी थी जिस का नाम था भगत सिंह.

जिस उम्र में आज के बच्चे स्मार्ट-फ़ोन पे या तो शदीद नफ़रत या फिर शदीद मुहब्बत को ढूंढते हैं, ये लड़का वो तरीक़े दुनिया को सिखा रहा था जिस से उस की धरती को गुलामी और तिरस्कार से मुक्ति मिल जाए.

23 मार्च 1931 को वो सिर्फ 23 साल का था मगर साम्राज्य के लिए एक असहनीय ख़तरा बन चुका था.

प्रस्ताव, आन्दोलन, और जश्न सब बहुत बाद में संभव हो पाए; समझबूझ और (स्वाधीनता की) मांग ऐसे बहुत से बलिदानों के बाद संभव हुई जब भगत सिंह और उस जैसे बहुत से लड़कों ने अपनी जान दे कर साम्राज्य को झिंझोड़ा.

आज़ादी उस के लिए एक सपना नहीं थी; आज़ादी उस का जूनून, उस के जीवन का उद्देश्य और उसी के शब्दों में उस की दुल्हन थी.

वो सिर्फ भारत का नहीं पाकिस्तान का भी हीरो है क्योंकि वो हिन्दोस्तान की आज़ादी का हीरो है.

लाहौर जहां उसे फांसी दी गई, वहाँ उस की यादगार न जाने कब बन पाए क्योंकि उस का तालुक़ हमारे मज़हब से नहीं था. अगर उस ने भी ये सोचा होता तो वो केवल सिखों की आज़ादी के लिए लड़ता. वो तो हिन्दुस्तान के लिए मर चला.

मेरा हीरो भगत सिंह और मुझे कोई संकोच नहीं कि मेरे हीरो की फेहरिस्त में एक सिख क्यों है?

क्योंकि आज हम सब जिस आज़ादी को महज़ जश्न और नाच-गाने की नज़र करते हैं, उस ने अपनी ज़िंदगी उस आज़ादी को दी.

हमारे साथ बड़ा अन्याय हुआ. हम से हमारे हीरो छीन लिए गए. हमें बताया ही न गया कि हम पर उपकार करने वाले कौन कौन हैं.

ख़ुद भगत सिंह का कहना था कि मैं एक इंसान हूँ और हर वो चीज़ जिस से इंसानियत को फ़र्क पड़ता है उस से मुझे फ़र्क पड़ता है.

वो इंसान था इसलिए वो क़ैद में भी आज़ाद था. हम सोच के क़ैदी आज़ाद हो कर भी क़ैद में हैं.

लाहौर हाईकोर्ट में शहीद भगत सिंह फाउंडेशन की तरफ से एक अपील लम्बित है जिसमें शादमान चौक को भगत सिंह के नाम पर रखने की मांग की गई है.

मगर चुनाव से थोड़ा पहले ज़िंदा हो जाने वाले मज़हब के दुकानदारों को इस से कुछ ख़तरा मालूम होता है और वो ऐसे किसी भी क़दम के विरोधी हैं. मगर हाँ भारत में गाय सम्बन्धी कोई भी घटना घट जाए तो विरोध प्रदर्शन यहाँ होता है.

ये और बात कि वहाँ अलीगढ़ यूनिवर्सिटी का नाम आज भी वही है; यहाँ कोई भगत सिंह यूनिवर्सिटी न बन सकी.

ये दरअसल सोच का फ़र्क है. हमारा यकीन है कि वो काफिर कोई नेकी नहीं कर सकते जबकि हम पैदाइशी मुसलमान खुद को जन्नत का अधिकारी बताते हैं; इस लिए बड़े गर्व से ग़लत काम करते हैं.

यहाँ लोग अपनी गाड़ी साफ़ रखने की लिए बाहर सड़क को गंदा रखते हैं. किसी के घर जाने का मक़सद अपनाइयत नहीं बल्कि जासूसी होता है. यहाँ लड़के के जवान होने को गर्व से और लडकी के जवान होने को चिंता की दृष्टी से देखा जाता है.

यहाँ किसी बीमार का हाल पूछने जाना भी केवल बदले या एहसान के लिए होता है. यहाँ 16-साल लम्बी शिक्षा सिर्फ़ डिग्री हासिल करने के लिए होती है, विवेक का विस्तार करने के लिए नहीं और यहाँ खुदा, नबी और विश्वास के नाम पर निजी फ़ायदों की दुकान लगती है.

मगर मेरा दुर्भाग्य है कि मुझ से मेरे हीरो छीन लिए गए. मेरे साहित्यकार और कवि विवादों के शिकार बना दिए गए.

मेरी धरती के असल रखवाले और उसकी रक्षा करने वाले मज़हब और पंथ की लकीर खेंच कर हम से दूर कर दिए गए और बाहर से ला-ला कर जंगजू हमारे हीरो बना कर थोप दिए गए.

ये वास्तव में अन्याय है.

अँधेरी रात है कि हम पर एहसान करने वाले सभी विवादों के शिकार हैं. हमें एक दायरे में लाकर छोड़ दिया गया है और हम घूमे जा रहे हैं और पूछे जा रहे हैं कि सफ़र कब ख़त्म होगा? मंजिल कब आयेगी?

वाक़ई अन्धेरा ही अन्धेरा है.
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इस पोस्ट में निम्नलिखित वेब-लिंक्स शामिल किये गए हैं.

1. http://www.humsub.com.pk/author/farrah-lodhi-khan/

2. http://www.humsub.com.pk/117494/farah-lodhi-khan-19/

3. https://farahlodhi.wordpress.com/

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